Earthing या भू-तार क्या है और वायरिंग में ये क्यों जरूरी है?

सभी लोग महंगे-से-महंगे सामान लगाकर अपने घर की वायरिंग करवाते हैं और उस wiring को सुन्दर तथा आकर्षक बनाने के लिए पैसे को पानी की तरह बहा देते हैं। हजारों रूपये खर्च करके लोग अपने वायरिंग को सुन्दर और डिजाईनदार तो बना लेते हैं लेकिन इस दौरान बहुत सारे लोग उन बातों पर कुछ खास ध्यान नहीं देते जो उनके लिए बहुत ही important होता है।

हमारे घरों में 220 volt के हाई वोल्टेज का ac सप्लाई दिया जाता है। वायरिंग या फिर इस्तेमाल किये जाने वाले उपकरण में खराबी आ जाने की वजह से उससे संपर्क हो जाने के बाद झटके लगने आम बात हो जाते हैं। कभी-कभार तो ये झटके इतने घातक होते हैं कि पीड़ित को अस्पताल भी जाना पड़ जाता है।

लेकिन यदि wiring करवाते समय ही इन सभी बातों का ध्यान रखा जाए और वायरिंग में भू-तार का भी connection करवा दिया जाए तो बाद में ऐसे किसी भी आकस्मिक स्थिति में कोई बड़ा नुकसान होने से बचा जा सकता है। भू-तार की wiring करवा देने से झटके लगने के चांस बहुत ही कम हो जाते हैं जिससे शरीर को ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचता है।


What is Bhoo-taar in Hindi
Image Source :- Max Pixel

लेकिन ज्यादातर लोगों को भू-तार के बारे में जानकारी नहीं होती है जिस वजह से वो अपने घरों में इसकी वायरिंग नहीं करवा पाते हैं और हमेशा ही खतरों से घिरे रहते हैं। तो चलिए, आज हम आपको भू-तार के वायरिंग के बारे में विस्तार से बताते हैं।


👤 भू-तार क्या है और इसकी जरूरत क्यों है?


भू-तार घर की वायरिंग में की जाने वाली एक ऐसी युक्ति है जिसके इस्तेमाल से wiring में सुरक्षा के प्रति विश्वसनीयता बढ़ती है। खराबी आ जाने की वजह से यदि किसी भी उपकरण के कैबिनेट में बिजली के झटके आने लगे, लेकिन यदि घर में भू-तार की भी वायरिंग करवाई गयी हो तो ऐसे खराब उपकरण से छू जाने के बाद भी शरीर को झटका नहीं लगता है और शरीर सुरक्षित रहता है।

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👤 वायरिंग में भू-तार का कनेक्शन कहाँ से निकाला जाता है?


बिजली के काम करने के लिए सिर्फ 2 connection wires की ही जरूरत पड़ती है। उसमें से एक गर्मी का वायर बिजली पोल के तार से जोड़ा जाता है और दूसरा ठंडी के वायर के कनेक्शन को धरती से निकाला जाता है। इन दोनों connection को अच्छी तरह से निकाल लेने के बाद किसी भी उपकरण का इस्तेमाल किया जा सकता है।


Electric pole for supply
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लेकिन भू-तार का connection बिजली के इस्तेमाल के लिए नहीं बल्कि सिर्फ सुरक्षा के लिए किया जाता है। जिस तरह से ठंडी का कनेक्शन धरती से निकाला जाता है ठीक उसी तरह से भू-तार के लिए भी connection wire को धरती से ही निकाला जाता है। इसके बाद धरती से निकालने के बाद इस तार का कनेक्शन सिर्फ इलेक्ट्रिक बोर्ड के 5-प्लग सॉकेट से ही किया जाता है।


👤 भू-तार का connection किसी उपकरण में कहाँ पर किया जाता है?


बिजली पर काम करने वाले किसी भी उपकरण को power के रूप में 220 volt ac दिया जाता है। सभी उपकरण को बिजली board से connect करने के लिए उसमें एक connection wire लगाया हुआ रहता है। इस wire के जरिये ही current उस उपकरण तक पहुँचता है। लेकिन साथ ही इस वायर को बिजली बोर्ड से कनेक्ट करने के लिए उसमें एक plug भी लगा हुआ होता है जिसे बोर्ड के shocket में insert किया जाता है।

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यदि आपने ऐसे ही कुछ उपकरणों का इस्तेमाल किया हुआ होगा तो आपने इस बात पर गौर जरूर किया होगा कि किसी उपकरण के कनेक्शन वायर के प्लग में सिर्फ 2 पिन ही होता है तो किसी उपकरण के प्लग में 3 पिन भी लगा हुआ होता है।


2 pin plug and 3 pin plug
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3 पिन वाले उपकरण के प्लग के 2 कनेक्शन पिन तो इनपुट सप्लाई के लिए ही होते हैं लेकिन इसका सबसे ऊपर वाला तीसरा पिन जो होता है वो पिन ही भू-तार के connection के लिए लगा हुआ होता है। ठीक इसी तरह से iron के power plug में भी 3 पिन लगे होते हैं जिनमें से सबसे ऊपर वाला पिन भू-तार की कनेक्शन के लिए ही होता है। साथ ही भू-तार वाला पिन किसी भी उपकरण के कैबिनेट से connect किया हुआ होता है।


👤 भू-तार कनेक्शन वाले उपकरण के उदाहरण


ऐसे बहुत सारे उपकरण हैं जिनमें भू-तार का कनेक्शन किया जाता है, तो वहीं बहुत सारे ऐसे उपकरण भी हैं जिनमें ये कनेक्शन नहीं किया जाता है। भू-तार के connection वाले उपकरण का एक अच्छा उदाहरण है - प्रेस आयरन। Iron एक ऐसा यन्त्र है जिसका इस्तेमाल आजकल लगभग सभी घरों में कपड़े को प्रेस करने के लिए किया जाता है। इस उपकरण में भू-तार के कनेक्शन को बहुत ही सरलतापूर्वक और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।


Automatic electric press iron
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कई बार technical folt की वजह से कपड़े को प्रेस करते समय आयरन से झटका भी लगने लगता है। हालांकि, आयरन से झटके लगने के कई वजह हो सकते हैं लेकिन ये समस्या ज्यादातर हमारे असावधानी की वजह से ही आती है। इन्हीं असावधानियों में से एक है, घर में भू-तार की wiring न करवाना।



Iron में भू-तार की कनेक्शन के लिए विकल्प तो दिया हुआ होता है लेकिन सही जानकारी नहीं होने की वजह से लोग उस कनेक्शन को फालतू का समझ बैठते हैं और उसकी वायरिंग नहीं करवाते हैं। बाद में ऐसे ही उपकरणों में जब कोई समस्या आती है और उसके कैबिनेट से sparking होने लगती है जिससे लोगों को शारीरिक नुकसान उठाना पड़ जाता है।

👤 भू-तार किस तरह से काम करता है और ये किस तरह से हमारी सुरक्षा करता है?


जब भी किसी उपकरण में स्पार्किंग की समस्या आती है तो इसका मतलब ये होता है कि उस उपकरण के कैबिनेट के संपर्क में करंट प्रवाहित कोई तार आ गया है। लेकिन चूंकि उस उपकरण के कैबिनेट से भू-तार वाला कनेक्शन जुड़ा हुआ होता है, इसलिए यदि घर में भू-तार की वायरिंग कराई हुयी होती है तो उस उपकरण के कैबिनेट से होते हुए भू-तार वाले वायर के द्वारा सभी प्रोटॉन (+ आवेश) धरती में समाहित होने लगते हैं। ऐसे में, स्पार्किंग होने के बावजूद भी उस उपकरण से छू जाने के बाद भी शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुँचता है।

हालांकि, भू-तार की वायरिंग के वजह से भले ही स्पार्किंग होने वाले उपकरण को छू लेने से भी कोई हानि न हो लेकिन यदि उस उपकरण के कैबिनेट से ac टेस्टर को सटाकर विद्युत के मौजूदगी की जांच की जाए तो झटका नहीं लगने के बावजूद भी tester के led बल्ब जल उठेंगे।


Ac tester for checking power supply
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साथ ही इस बात का भी ध्यान रहे कि भू-तार कनेक्शन के दौरान किसी भी उपकरण में स्पार्किंग की वजह से ज्यादा बिजली की खपत होती है जिससे बिजली बिल में भारी बढोत्तरी हो सकती है। इसलिए यदि कभी भी किसी उपकरण में sparking का शक हो तो तुरंत उसकी मरम्मत करवा लें अन्यथा आपको आर्थिक और शारीरिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

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Stabilizer बनाने के लिए जरूरी सभी componants के लिस्ट

Componants for making 200/300 watts mannual stabilizer


Stabilizer से आपलोग परिचित तो होंगे ही। इसका इस्तेमाल बिजली के voltage को नियंत्रित करने में किया जाता है। विभिन्न तरह के कामों के लिए विभिन्न तरह के स्टेबलाईजर की जरूरत पड़ती है। लेकिन यदि बात करें आमतौर पर सभी घरों में छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले stabilizer की, तो आमतौर पर सभी घरों में 200 या 300 watts के स्टेबलाईजर इस्तेमाल किये जाते हैं। हालांकि, market में 200/300 वाट्स के रेडीमेड स्टेबलाईजर भी उपलब्ध होते हैं लेकिन उनकी गुणवत्ता किसी machenic द्वारा बनाये गए स्टेबलाईजर से कम ही होती है।

ऐसा नहीं है कि readymade स्टेबलाईजर खराब होते हैं, लेकिन ये सच है कि मैकेनिक द्वारा बनाये गए स्टेबलाईजर उससे कहीं ज्यादा बेहतर होते हैं। तो ऐसे में यदि आपको भी अपने घर के छोटी-सी जरूरतों को पूरा करने के लिए 200/300 watts के stabilizer की जरूरत है तो market से खरीदने के बजाये आप किसी मैकेनिक से भी बनवा सकते हैं। लेकिन यदि आप खुद ये काम करने में interest रखते हैं और electronics में आपका थोड़ा-सा भी अनुभव है तो आप हमारे द्वारा बताये तरीकों को follow करके खुद से भी स्टेबलाईजर को बना सकते हैं। तो चलिए आज जानते हैं कि एक 200 या 300 watts के mannual stabilizer को बनाने में किन-किन सामानों का उपयोग किया जाता है।


👤 200/300 watts के stabilizer बनाने के लिए जरूरी सामानों के list

1) Cabinet (ढ़ांचा या खोला)

स्टेबलाईजर के सभी सामानों को जिस ढाँचे या खोले में फिट किया जाता है उसे cabinet कहा जाता है। आपके जरूरत के अनुसार बनाये जाने वाले stabilizer के अनुसार उसके लिए अलग-अलग cabinet की जरूरत पड़ सकती है। आमतौर पर 200 watts और 300 watts के stabilizer को एक ही कैबिनेट में fit कर दिया जाता है क्योंकि दोनों watts के transformer अलग-अलग size के जरूर होते हैं लेकिन एक ही cabinet में आराम से फिट आ जाते हैं। 


200 watts stabibilizer allcomponants list


इसके बाद फिर इसके बाद बाकी सभी componants दोनों ही watts के स्टेबलाईजर में एक ही तरह के इस्तेमाल किये जाते हैं। लेकिन एक बात का ख़ास ध्यान रहे कि अभी हम आपको mannual stabilizer के बारे में बताने जा रहे हैं। इसलिए इसे बनाने के लिए आपको mannual स्टेबलाईजर के cabinet खरीदने की ही जरूरत पड़ेगी। यदि आप automatic वाला cabinet खरीदेंगे तो उसमें mannual स्टेबलाईजर के componants को फिट नहीं किया जा सकेगा। आमतौर पर mannual स्टेबलाईजर के cabinet की कीमत 70 रूपये के करीब पड़ती है।

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2) 200 या 300 watts का auto transformer (ऑटो ट्रांसफार्मर)

सबसे पहले आपको ये जान लेना बहुत ही जरूरी है कि किसी भी स्टेबलाईजर का मुख्य भाग transformer ही होता है। किसी भी stabilizer का वजूद सिर्फ-और-सिर्फ उसके transformer से ही होता है। बाकी जो भी componants लगाये जाते हैं, वो सिर्फ आसानी से इस्तेमाल करने योग्य बनाने के लिए लगाये जाते हैं। तो, यदि आप 200 watts का stabilizer बनाना चाहते हैं तो आपको transformer भी 200 वाट्स का ही लेना होगा लेकिन यदि आप 300 watts का स्टेबलाईजर बनाना चाहते हैं तो आपको ट्रांसफार्मर भी 300 वाट्स का ही लेना होगा।

यदि stabilizer में इस्तेमाल किये जाने वाले एक सामान्य ट्रांसफार्मर की बात करें तो 200 watts के ट्रांसफार्मर की price 300 रूपये और 300 watts के transformer की कीमत 450 रूपये तक हो सकती हैं। अर्थात दोनों के कीमत में 150 रूपये का अंतर। इसलिए हमारी पर्सनल सलाह ये है कि यदि आप 300 watts के लिए transformer खरीदने में सक्षम हैं तो 200 वाट के बजाये 300 वाट्स के ही stabilizer बनाएं ताकि बाद में जरूरत पड़ने पर आप उसपर 300 watts तक का भी लोड दे सकें।


3) DPDT (Double Pole Double Throw) Switch

Stabilizer का उपयोग 2 स्थितियों में किया जाता है। पहली, जब हमारे घर में जरूरत से कम वोल्टेज हो, तो उस समय हम स्टेबलाईजर का इस्तेमाल step-up के रूप में करते हैं जिसके तहत हमें जरूरत के अनुसार original voltage की अपेक्षा ज्यादा voltage मिलते हैं। दूसरी, जब हमारे घर में जरूरत से ज्यादा वोल्टेज हो तो उस समय stabilizer का इस्तेमाल हम step-down के रूप में करते हैं। इस स्थिति में स्टेबलाईजर हमें high volt के ओरिजिनल voltage से कम और उचित volt का supply प्रदान करता है।

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एक mannual स्टेबलाईजर में step-up और step-down को निर्धारित करने के लिए जिस switch का इस्तेमाल किया जाता है उसे DPDT स्विच कहा जाता है। DPDT का full form होता है, Double Pole Double Throw. इस स्विच का काम होता है एक बार में 2 connection के रूट को बदलना। 200 watts के stabilizer में 5 ampere तक का DPDT इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी कीमत 10-15 रूपये होती है।


4) Rottery switch

चूंकि हम mannual (हस्तचालित) स्टेबलाईजर बनाने जा रहे हैं तो जाहिर-सी बात है कि इसमें voltage को नियंत्रित करने के लिए किसी बहुविकल्पीय switch की तो जरूरत पड़ेगी ही। स्टेबलाईजर में इसी स्विच को रोटरी स्विच के नाम से जाना जाता है। इस स्विच में वोल्टेज को नियंत्रित करने के लिए 1 से लेकर 8 तक विकल्प होते हैं। 

यदि stabilizer स्टेप-अप मोड में हो तो rottey स्विच के 1 नंबर पर उतना ही volt आउट होगा जितना बिजली का ओरिजिनल volt होगा। इसके बाद ज्यों-ज्यों इस rottery को दायें तरफ घुमाकर इसे ज्यादा नंबर पर करते जायेंगे इसका output voltage बढ़ता जायेगा। इस तरह से कोई भी स्टेबलाईजर ओरिजिनल वोल्टेज के दोगुना तक voltage प्रदान कर सकता है।

यदि stabilizer स्टेप-डाउन मोड में हो तो भी rottery switch के 1 नंबर पर रहने पर ये original input के बराबर voltage ही आउट करेगा। लेकिन ज्यों-ज्यों इस स्विच को दायें तरफ घुमाकर ज्यादा नंबर पर करते जायेंगे इसका आउटपुट वोल्टेज कण होता जायेगा। इस तरह से कोई भी stabilizer original वोल्टेज का आधा तक voltage को आउट कर सकता है।

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लेकिन एक बात का ध्यान रहे, हमने आधे और दोगुने voltage मिलने की बात सिर्फ-और-सिर्फ सामान्य तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली stabilizer के बारे में ही बताया है। हकीकत तो ये है कि ख़ास तरह से बनाये गए transformer से ओरिजिनल voltage के मुकाबले जितना चाहे उतना कम और जितना चाहे उतनी ज्यादा voltage प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरत के अनुसार ख़ास तरह के ट्रांसफार्मर की जरूरत पड़ेगी।


5) Relay kit (रिले किट)

घरों में कभी भी एक-समान voltage नहीं रहते हैं। वोल्टेज में हमेशा ही उतार-चढ़ाव होते रहता है। इसलिए ऐसे हालत में stabilizer के output voltage भी input voltage के अनुपात में घटते-बढ़ते रहते हैं। लेकिन ऐसे में कभी-कभी आउटपुट वोल्टेज जरूरत से ज्यादा हो जाता है तो कभी कम हो जाता है। जब आउटपुट वोल्टेज कम होता है तब तो कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जब स्टेबलाइजर का आउटपुट वोल्टेज जरूरत से ज्यादा हो जाए तो इसमें लगाये उपकरण को नुकसान पहुँच सकता है।


Stabilizer 7 ampere relay kit


इसी समस्या को दूर करने के लिए stabilizer में एक relay किट लगाया जाता है। इस किट की खासियत ये होती है जब भी पहले से सेट किये गए वोल्टेज से ज्यादा voltage आउट होने लगता है तब ये किट सक्रिय हो जाता है और output का supply रोक देता है। ऐसे में stabilizer के output पर supply आना बंद हो जाता है जिससे इससे जुड़े हुए उपकरण को भी supply नहीं मिलता है और वो उपकरण काम करना बंद कर देता है।

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Relay kit द्वारा over supply को रोकने की इस क्रिया को auto cut (ऑटो कट) कहा जाता है और इस स्थिति में स्टेबलाइजर में लगा हुआ red colour का led (बल्ब) जल उठता है जिससे लोगों को ऑटो-कट होने का पता तुरंत चल जाता है और वो फिर से rottery switch को घुमाकर सही point पर कर देते हैं जिससे फिर से supply मिलने लग जाता है। Relay लगे हुए रिले किट की कीमत करीब 30 रूपये तक पड़ती है।


6) Main wire (मुख्य तार)

Stabilizer में supply देने के लिए जिस wire का इस्तेमाल किया जाता है उसे main wire कहा जाता है। Market में प्लग लगे हुए बहुत तरह के main wire उपलब्ध हैं। स्टेबलाइजर में सामान्यतः 2 मीटर का वायर उपयोग किया जाता है जिसकी कीमत करीब 25 रूपये तक हो सकती है। यदि आप चाहें तो खुद से भी अच्छी quality का लूज वायर और plug लेकर उसे main wire की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।


7) Fuse और fuse holder

ऐसा नहीं है कि घरों में हमेशा कम voltage ही होते हैं। बहुत बार तो जरूरत से भी ज्यादा voltage घरों में होते हैं और ऐसी स्थिति में stabilizer के dpdt स्विच को down करना पड़ जाता है। लेकिन जब input voltage बहुत ज्यादा हो तो या फिर जब भी स्टेबलाइजर में किसी तरह की कोई शॉर्ट-सर्किट हो तो उस स्थिति में उसके transformer को नुकसान पहुँच सकता है।

इस स्थिति से बचने के लिए स्टेबलाइजर में fuse का इस्तेमाल किया जाता है। जब भी किसी तरह की कोई शॉर्टिंग की समस्या होती है तो उस समय कोई भी उपकरण जरूरत से ज्यादा current की खपत करने लगता है। ऐसा ही stabilizer के साथ भी होता है और शॉर्टिंग के समय ये भी जरूरत से ज्यादा current खपत करने लगता है जिसे fuse बर्दाश्त नहीं कर पाता है और वो जल जाता है। फ्यूज के जलते ही stabilizer में supply मिलना बंद हो जाता है और फिर इसके बाद किसी भी तरह का कोई नुकसान होने से भी बच जाता है।

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लेकिन चूंकि fuse बार-बार जलते रहता है, तो इस स्थिति में हर बार stabilizer के cabinet को खोलकर उसका फ्यूज बदलना बहुत ही मुश्किल भरा काम हो सकता है। इसलिए किसी भी उपकरण में एक fuse holder को इस तरह से लगा दिया जाता है कि जब भी इसका फ्यूज जले तो बिना cabinet को खोले ही उसे सिर्फ फ्यूज होल्डर के ढक्कन को खोलकर फ्यूज को आसानी से बदला जा सके।


8) Switch और 5-pin shocket

जब भी किसी device का उपयोग न करना हो तो उसे off करने के लिए उसमें एक switch लगा हुआ होता है। Stabilizer में भी एक स्विच लगाया जाता है ताकि जब जरूरत न हो तब इसे ऑफ कर दिया जाये। साथ ही, स्टेबलाइजर से किसी भी दूसरे उपकरण को जोड़ने के लिए एक 5-पिन शॉकेट का इस्तेमाल किया जाता है। इसी shocket में दूसरे उपकरण के प्लग को लगाया जाता है जिसके बाद उस उपकरण को stabilizer के द्वारा आउट किया गया supply मिलने लगता है।


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9) Voltmeter (वोल्टमीटर)

Mannual stabilizer में output voltage की निगरानी करने के लिए उसमें एक voltmeter भी लगाया जाता है। इससे लोगों को हमेशा ही पता चलते रहता है कि stabilizer उस समय कितना volt को आउट कर रहा है। यदि मीटर में कम या ज्यादा वोल्ट प्रदर्शित हो रहा होगा तो लोग उसे देखकर voltage को फिर से नियंत्रित भी कर सकते हैं।


10) Led और led rubber

Mannual stabilizer में 3 तरह के led (एक तरह का बल्ब) का इस्तेमाल किया जाता है।

1. Green led :- जिस समय स्टेबलाइजर सही से अपना काम कर रहा होता है, उस समय उसमें लगा हुआ हरा रंग का एलईडी जलता है जिसका मतलब होता।

2. Red led :- Auto-cut हो जाने की स्थिति में लाल रंग का एलईडी जलता है जिससे लोगों को ऑटो-कट होने का पता तुरंत चल जाता है।

3. Yellow led :- यदि stabilizer का fuse जल जाए तो उस समय स्टेबलाइजर काम करना बंद कर देता है। तो ऐसे में एक साधारण लोग समझेंगे कि कहीं स्टेबलाइजर खराब तो नहीं हो गया है। इसलिए इसमें एक पीले कलर का एलईडी भी लगाया जाता है जो फ्यूज के जल जाने की स्थिति में जलता है। ऐसे में लोगों को तुरंत पता चल जाता है कि फ्यूज जल गया है और फिर इसके बाद वो खुद से भी इसे बदल सकते हैं।

Led rubber:- Stabilizer के cabinet में led के size से बड़ा छेद किया हुआ रहता है जिसमें led को नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए इस छेड़ में एक led रबर लगाया जाता है और तब इस रबर में ही led को लगाया जाता है। इस रबर का का एक और फायदा ये होता है कि cabinet से led का सीधा संपर्क ख़त्म हो जाता है जिससे स्पार्किंग होने का चांस ख़त्म हो जाता है।


11) Scroo और nut-bolts

सभी componants को कैबिनेट से कसने के लिए विभिन्न तरह के स्क्रू और नट-बोल्ट्स का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही cabinet को रखे जाने के स्थान से ऊँचा करने के लिए कुछ गोरे का इस्तेमाल भी किया जाता है।

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Wiring में होने वाले top 10 common mistakes

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1) जगह और रूट का पहले से कर चयन न करना


आप जब भी wiring करें तो इसे शुरू करने से पहले इस बात का अच्छी तरह से फैसला कर लें कि आपको कहाँ पर किस चीज का इस्तेमाल करना आसान रहेगा और ज्यादा सुरक्षित होगा? मान लीजिये कि आपका एक ही रूम है और वो छोटा है तो आप गेट पर ही तो board को फिट नहीं कर देंगे न? इसलिए wiring का काम शुरू करने से पहले ही ये निश्चित कर लें कि कहाँ पर meter लगवाना है, कहाँ पर बोर्ड फिट किया जाना है और बोर्ड में कौन-कौन से componants लगे होने चाहिए?



सबसे बड़ी बात ये कि wire को एक जगह से दूसरे जगह ले जाने के लिए किस रूट का उपयोग करें? मतलब कि कहाँ से और किस तरह से तार को फैलाएं ताकि कम-से-कम खपत भी हो और देखने में भी अच्छा लगे। और इसी तरह से इस बात का भी फैसला करें कि किस जगह पर बोर्ड को फिट किया जाये ताकि आपको सहूलियत हो।

2) सस्ते और घटिया क्वालिटी के सामानों का उपयोग करना 

घर के wiring बार-बार नहीं किये जाते हैं। इसलिए जब भी वायरिंग करवाएं या करें तो वो ऐसा होना चाहिए कि future में उससे आपको किसी भी प्रकार की कोई दिक्कत न आये। हालांकि, वायरिंग में प्रयोग होने वाले सारे componants बहुत ही महंगे होते हैं और 2 room की wiring करवाने में भी हजारों रूपये खर्च हो सकते हैं। इसलिए अधिकांश लोग थोड़े से रूपये बचाने के चक्कर में घटिया quality के ही सारे सामान खरीद लेते हैं जो कि समय से पहले ही खराब होने लगते हैं। 

सस्ते सामानों में अक्सर टूट-फूट की समस्या आ जाती है जिस वजह से घर का wiring असुरक्षित हो जाता है और इसमें बाहरी नुकसान का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए जब भी वायरिंग करवाएं तो इस बात का ख़ास ख्याल रखें कि उसमें इस्तेमाल किये जाने वाले सभी सामान किसी branded company के हों और मजबूत हों। हमारे यहाँ आमतौर पर Anchor और Havells के componants के उपयोग किये जाते हैं जो कि बेहद ही मजबूत और टिकाऊ माने जाते हैं और इनकी Life भी बेहतर होते हैं।

3) Best componants के उपयोग के बावजूद भी low quality के wires का इस्तेमाल करना 

हमारे घरों की Wiring में सभी तरफ से जमकर पैसे खर्च हो जाते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा खर्च wiring के लिए wires पर ही हो जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि बाकी सभी componants तो कहीं-कहीं पर ही इस्तेमाल होते हैं लेकिन wire के इस्तेमाल सभी जगह पर किये जाते हैं। साथ ही wire में महंगे धातु के इस्तेमाल भी किये जाते हैं जिस वजह से ये महंगे होते हैं। कहने का तात्पर्य ये है कि आपका घर जितना बड़ा होगा और आप जितने ज्यादा दूरी में कोई उपकरण इस्तेमाल करेंगे उतने ही ज्यादा लम्बाई के वायर की आपको जरूरत पड़ेगी।

दूसरी वजह ये है कि इतने लम्बे पूरे तार में Copper (कॉपर) या Aluminium (एल्युमीनियम) जैसे महंगे धातु का इस्तेमाल किये जाते हैं जिस वजह से ये बहुत ही महंगे हो जाते हैं और प्रति मीटर अच्छे क्वालिटी के copper के वायर की कीमत करीब 20 रूपये से भी ज्यादा पड़ जाते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि पैसे बचने के लिए कोई भी घटिया क्वालिटी के wires का इस्तेमाल wiring में कर दिया। यदि पहली बार में आप गलत वायर से वायरिंग करते हैं तो बाद में कोई भी दिक्कत आने पर लम्बा-चौड़ा खर्च लग सकता है। इसलिए पहली बार में ही अच्छे wire से wiring करें ताकि आगे चलकर उससे आपको कोई परेशानी न आये।

4) Copper के बजाये Aluminium के wires का इस्तेमाल करना

जब भी आप wiring करें तो सिर्फ-और-सिर्फ copper यानि कि ताम्बे के तार का ही इस्तेमाल करें। हालांकि ये एल्युमीनियम के तार की अपेक्षा 2-3 गुना तक महंगा हो सकता है लेकिन यकीन मानिए ये आपके लिए बहुत ही अच्छा विकल्प है। एल्युमीनियम के तार कॉपर के अपेक्षा कमजोर और ज्यादा लचीला होता है और 3-4 बार गाँठ पड़ने से टूट भी जाता है लेकिन कॉपर इतना कमजोर नहीं होता है। साथ ही ज्यादा समय हो जाने के बाद aluminium के वायर के छोर पर गंदगी जमा हो जाते हैं जिस वजह से वो सही से काम करना बंद कर देता है। लेकिन वहीँ यदि बात करें कॉपर के wire की तो इसमें ऐसा कोई बात नहीं है। कॉपर के तार बहुत लम्बे समय तक सुरक्षित रहते हैं और हमेशा ही सही से काम करते हैं।

5) Wiring में insulating tape का ज्यादा इस्तेमाल करना

वायरिंग के दौरान यदि एक bundle का wire बीच में ही ख़त्म हो जाता है या फिर किसी भी कारणवश जब wiring के बीच 2 तार को आपस में जोड़ना होता है तब तार को छीलकर उसे आपस में लपेट दिया जाता है और फिर उसके बाद उसके ऊपर टेप को अच्छे से लपेट दिया जाता है। लेकिन बहुत सारे लोग tape का सही से इस्तेमाल करना नहीं जानते हैं और गलत तरीके से उसका इस्तेमाल कर देते हैं।

electrical tape uses
Image Source :- Wekipedia


बहुत सारे लोग wire को आपस में लपेटने के समय ही ढीलापन छोड़ देते हैं जिस वजह से वहां से sparking होने लगता है और वो हिस्सा गर्म होकर जलने लगता है। इस वजह से कभी-कभी आग लगने की भी स्थिति बन जाती है। इसलिए पूरी कोशिश करें कि वायरिंग में टेप का इस्तेमाल कम-से-कम करना पड़े और जहाँ भी उसका इस्तेमाल हो तो बहुत ही मजबूती से हो और किसी भी तरह का कोई ढीलापन न हो।

6) बोर्ड में Fuse और Indicator का इस्तेमाल नहीं करना

Electric board में फ्यूज और इंडिकेटर का बहुत ही महत्त्व है। Fuse से wiring सुरक्षित रहता है और जरूरत पड़ने पर पूरे घर के बिजली सप्लाई को बंद भी किया जा सकता है। साथ ही Indicator के माध्यम से बिजली के उपस्थिति या अनुपस्थिति का तुरंत पता चल जाता है। साथ ही इनके और भी बहुत सारे फायदे हैं। इसलिए जब भी wiring करें अपने board में fuse और indicator का इस्तेमाल जरूर करें।

7) Wiring में cuircit breaker का इस्तेमाल न करना

अकसर हमारे साथ आपातकालीन घटना घटते रहते हैं। पता नहीं कब क्या हो जाए, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। ऐसे कई मौके आते हैं जब wiring की कमजोरी या फिर हमारे ही छोटी सी गलतियों के वजह से हमें बिजली के झटके लग सकते हैं और हम प्रवाहित बिजली में चिपके रह सकते हैं। तो ऐसे आपातकालीन स्थितियों के लिए आप पहले से ही अपने घर के हरेक कमरे की wiring में एक ऑटोमेटिक सर्किट ब्रेकर जरूर लगवा लें।

इससे आपको फायदा ये होगा कि जब भी कभी ऐसे आपातकालीन समय आयेंगे तब ये ये ब्रेकर ज्यादा current प्रवाहित होने के वजह से खुद ही स्टार्ट हो जायेंगे और फिर वायरिंग का circuit ब्रेक हो जायेगा जिससे कि करंट का प्रवहन रूक जायेगा और पीड़ित लोग को कम नुकसान होगा और उचित इलाज मिलने के बाद वो जल्दी ही ठीक हो जायेगा।

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8) मीटर के ठीक बाद एक Changer जरूर लगायें

वैसे तो उस तरह से वायरिंग करें ही नहीं जिससे कि बाद में उसकी मरम्मत करने की नौबत आये। लेकिन संयोगवश यदि ऐसी कोई नौबत आये या फिर किसी भी वजह से आपको वायरिंग में कुछ काम और करने पड़ जाएँ तो उस समय विद्युत् प्रवाहित वायरिंग के साथ काम करना सही नहीं होगा। इसके लिए आपको सबसे पहले बिजली के पोल पर जाकर अपने कनेक्शन wire को उतरना पड़ेगा जिससे कि आपके घर में supply आना बंद हो जाये और आप बेहिचक मरम्मत का काम कर सकें।

लेकिन ये प्रक्रिया बहुत ही कठिन और खतरनाक है। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक्स में इस समस्या को देखते हुए Changer का निर्माण किया गया है। Unit meter से निकले दोनों तार को इस चेंजर से जोड़ा जाता है और फिर इसी चेंजर के दूसरे भाग से output निकाला जाता है जिसका wiring में इस्तेमाल किया जाता है। इसका काम ये होता है कि जब इसे ऑफ किया जाता है तब ये विद्युत् के प्रवाहन को रोक देता है जिससे कि आप बेफिक्र होकर वायरिंग में जो चाहें बदलाव कर सकते हैं।

9) Wiring में भू-तार का connection नहीं करवाना

बहुत सारे उपकरण ऐसे होते हैं जिसके cabinet (उपरी आवरण) पर shorting या फिर कनेक्शन वायर के टूट जाने के वजह से बिजली के झटके आने लग जाते हैं। ऐसी हालत में यदि इन उपकरणों को सप्लाई देकर छू लिया जाए तो इससे झटके लगने से शारीरिक नुकसान भी पहुँच सकते हैं। इन सभी समस्याओं को दूर करने के लिए ऐसे सारे उपकरणों में ही एक विकल्प दिए हुए होते हैं जिसे भू-तार के नाम से जाना जाता है। ये क्या है और ये किस तरह से हमारी रक्षा करता है इसके बारे में विस्तारपूर्वक जानने के लिए हमारा ये पोस्ट जरूर पढ़ें.....

• जानिये, Wiring ( वायरिंग ) में भू-तार किस तरह से हमारी सुरक्षा करता है?

10) बिजली बोर्ड में एक ही 5-pin या 2-pin socket लगवाना

पहले हमारे जरूरत बहुत ही कम हुआ करते थे। लेकिन अब हमारे जरूरत असीमित हो गए हैं। हमलोग टीवी तो रूम में देखते ही हैं लेकिन साथ-ही-साथ इससे भी ज्यादा उपकरणों का इस्तेमाल एक साथ करते हैं। तो ऐसे में यदि हमारे board में इन सभी के plug को लगाने के लिए उचित संख्या में सॉकेट न हों तो इसके लिए आपको अलग से एक एक्सटेंशन बोर्ड खरीदना पड़ सकता है। लेकिन आपके बोर्ड में ही इतने जगह खाली रहते हैं कि आप उसी में 3-4 सॉकेट और लगवा सकते हैं और ये एक्सटेंशन बोर्ड से भी ज्यादा अच्छा विकल्प होगा। इसीलिए वायरिंग कराते वक़्त ही इन छोटे-मोटे बातों का ध्यान जरूर रखें ताकि बाद में ज्यादा खर्चे से बच सकें।

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Stabilizer क्या है और इसे खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

👤 Stabilizer ( स्टेबलाईजर ) क्या है और ये किस काम आता है ?

आजकल सभी घरों में पंखे, LCD, DTH इत्यादि के इस्तेमाल आम बात हो गए हैं। लेकिन सामान्य तौर पर हमारे घरों में इतने कम voltage होते हैं कि उतने में इन्हें चला पाना मुश्किल होता है और यदि किसी तरह ये चल भी जाए तो इसके खराब होने की आशंका भी बहुत हो जाती है। वहीँ कहीं-कहीं तो जरूरत से इतने ज्यादा voltage हैं कि ये सभी उपकरण महीनेभर में ही जल जाते हैं। लेकिन जब कुछ रूपये के खर्च में ही आपके इस समस्या का समाधान मौजूद हो तो फिर रिस्क लेने की भला जरूरत ही क्या है? शायद ही किसी को ये बात पता न हो कि इस समस्या के समाधान के लिए already एक electronic उपकरण की खोज की जा चुकी है जिसका नाम है स्टेबलाईजर।


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जी हाँ, यदि आप भी अपने घरों में बेतरतीब वोल्टेज की समस्या से परेशान हैं तो ये उपकरण आपके लिए ही बनाये गए हैं। इस स्टेबलाईजर की सबसे बड़ी विशेषता ये होती है कि यदि आपके घरों में कम वोल्टेज की समस्या है तो ये उसे 2 गुना तक बढ़ा सकता है और यदि आप ओवरलोड voltage की समस्या से परेशान हैं तो ये उसे भी आधा तक कर सकता है। आमतौर पर सारे स्टेबलाईजरों में ये खासियत होती है। इसकी help से आपके सभी उपकरण सुरक्षित रहते हैं और लम्बे समय तक अच्छे से अपना काम करते रहते।

👤 इस्तेमाल के आधार पर Stabilizer कितने तरह का आता है ?

हमारे घरों के वोल्टेज कभी भी एक समान नहीं रहते हैं और इसमें हमेशा ही उतार-चढ़ाव आते रहता है। तो ऐसे में जाहिर सी बात है कि इस स्थिति में स्टेबलाईजर के output voltage में भी हमारे घरों के voltage के अनुपात में ही उतार-चढ़ाव आएगा। तो सामान्यतः ऐसा भी हो जाता है कि कभी हमारे घरों में कम वोल्टेज रहता है और उस समय हम स्टेबलाईजर को इस तरह से adjust किये हुए होते हैं कि वो हमें 220 वोल्ट AC output के रूप में देता है लेकिन ज्योंहि घरों के voltage में वृद्धि होती है ठीक तभी इसका output voltage भी बढ़ जाता है और 220 V से ज्यादा हो जाता है।

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तो ऐसे में हमारे उपकरण को जरूरत से ज्यादा supply मिलने लग जाते हैं जिस वजह से उसके जलने की संभावना बढ़ जाती है। तो हमारे इन्हीं समस्या को देखते हुए स्टेबलाईजर में output voltage को कम-ज्यादा करने का भी विकल्प दिया हुआ होता है और हमारे इसी जरूरत के आधार पर स्टेबलाईजर भी निम्नलिखित 2 तरह के बनाये जाते हैं।

1) Manually stabilizer - ये स्टेबलाईजर मार्केट में सबसे कम price में मिलता है। जब कभी भी हमारे घर के voltage में बढ़ोत्तरी होती है और इस stabilizer के output से overload वोल्टेज आने लगती है और तब इस स्थिति में इसके output से suppy मिलना खुद ही बंद हो जाता है और stabilizer में लगा हुआ लाल led जल उठता है जिससे ये पता चलता है कि stabilizer में auto-cut हो गया है। और फिर auto-cut का पता चलते ही हमें stabilizer के rottery switch के नोब को घुमाकर voltage को कम करना पड़ता है तब जाकर इसके output से suppy मिलता है। चूंकि इसके output voltage को हमें खुद ही control करना होता है इसलिए इसे manually stabilizer कहा जाता है।

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2) Automatic stabilizer - जब कभी हमारे घरों में एकाएक से ज्यादा supply आ जाती है तो ऐसे में Stabilizer के output से भी ज्यादा suppy मिलने लगता है। लेकिन इस stabilizer में ऐसी कोई बात नहीं होती। इसके अन्दर लगा automatic किट की setting कुछ इस तरह से कर दी जाती है कि ये हमेशा output voltage को पहले से तय किये हुए जितना के लगभग ही रखता है। आमतौर पर किसी भी नए automatic stabilizer में output voltage को 200 volt पर सेट किया जाता है जिसे आप अपनी जरूरत के अनुसार कम या ज्यादा भी करा सकते हैं। चूंकि ये stabilizer खुद ही voltage को maintain करता है इसलिए इसे automatic stabilizer कहा जाता है। हालांकि ये स्टेबलाईजर manually stabilizer से थोड़ा-सा costly आता है लेकिन इसका इस्तेमाल उसके तुलना में बहुत ही आरामदायक होता है।

👤 गुणवत्ता के आधार पर stabilizer कितने तरह का होता है ?

जब भी हम कोई सामान खरीदते हैं तो इस बात का ध्यान जरूर रखते हैं कि वो सामान उच्च गुणवत्ता वाला हो और ज्यादा समय तक चल सके। तो ठीक इसी तरह से जब भी आप कोई भी stabilizer खरीदने जाएँ तो इस बात का ध्यान रखें कि उसमें इस्तेमाल किये गए सामान ठोस और टिकाऊ हो। इसके बाद जब भी आप ये सुनिश्चित हो जाएँ कि उसके सारे componants सही हैं तो भी आपको एक सबसे बड़ी बात का ध्यान रखना होगा।

दरअसल stabilizer का सारा काम उसमें इस्तेमाल किये गए transformer पर ही निर्भर रहते हैं। यदि ट्रांसफार्मर उच्च क्वालिटी के सामानों से न बना हो तो उस stabilizer की कोई गारंटी नहीं कि वो कब खराब हो जाए। आमतौर पर किसी भी transformer की गुणवत्ता उसमें इस्तेमाल किये गए कोर और क्वाईल पर ज्यादातर निर्भर करता है। कोर तो किसी हद तक सही है, लेकिन यदि उसमें low quality के coil का इस्तेमाल किया जाए तो वो जल्द ही खराब हो सकता है। आमतौर पर एल्युमीनियम के coil को low quality का माना जाता है और copper यानि तांबा के coil को transformer के लिए सही माना जाता है। 

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इसलिए जब भी मार्केट से कोई भी stabilizer खरीदने जाएँ तो इस बात को जरूर सुनिश्चित कर लें कि उसके transformer में copper के coil का इस्तेमाल किया गया हो। हालांकि aluminium के अपेक्षा copper coil के transformer वाला stabilizer जरा-सा महंगा जरूर होता है लेकिन गुणवत्ता में ये उसके मुकाबले लाख गुना अच्छा होता है।

👤 Stabilizer पर अधिकतम कितना लोड दिया जा सकता है ?

जिस तरह से किसी भी इंसान और मशीन के काम करने की एक क्षमता होती है ठीक उसी तरह से एक stabilizer के काम करने की भी एक क्षमता होती है। आप कितने उपकरण को stabilizer पर इस्तेमाल करना चाहते हैं उस हिसाब से calculate करके आपको stabilizerखरीदना पड़ता है। Example के लिए मान लीजिये कि यदि आप सिर्फ एक lcd, fan और एक dth के लिए stabilizer खरीदना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे पहले इन तीनों उपकरणों के watts को calculate कीजिये।

आमतौर पर तीनों उपकरण अलग-अलग लगभग 65 watt के होते हैं तो इस तरह से उन तीनों को मिलाकर हो जाता है 195 watts. तो अब चूंकि आपको सिर्फ 195 watts के उपकरण के लिए ही stabilizer खरीदना है तो इसलिए आप मार्केट से 200 watt का एक रेडीमेड staibilizer ले सकते हैं। वैसे भी इससे कम वाट का stabilizer मार्केट में मिलता भी नहीं है जिस वजह से कम uses रहने पर भी आपको इतने watts का खरीदना ही पड़ेगा। यदि आपको लगता है कि आने वाले कुछ समय के बाद आप इसपर और भी कुछ उपकरण इस्तेमाल कर सकते हैं तो उस आधार से आप 300 watt या फिर इससे भी ज्यादा watts के stabilizer खरीद सकते हैं।

सावधानी :- एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इन छोटे-मोटे stabilizer पर कभी भी press iron का इस्तेमाल न करें। सामान्य तौर पर अब automatic iron का इस्तेमाल किया जाता है जो 500 से 1000 watts तक का होता है। ऐसे में यदि आप इसे 200 या 300 watts जैसे छोटे stabilizer से जोड़ देंगे तो आपका stabilizer पलभर में ही जलकर खराब और बेकार हो जायेगा। इसलिए यदि आप press iron के लिए stabilizer खरीदना चाहते हैं तो कम-से-कम 1000 watts यानी 1 KV का ही खरीदें।

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Electric board में fan regulator का connection कैसे किया जाता है?


Home wiring fan regulator speed controler gadget


बहुत सारे बिजली उपभोक्ता ऐसे होंगे जो Home Wiring करवाते वक़्त अपने electric board में fan regulator नहीं लगवाते होंगे। शायद ही कोई ऐसे users होंगे जिन्हें इसके बारे में पता नहीं है। सभी इससे होने वाले लाभ और बचत के बारे में भी जानते होंगे लेकिन फिर भी बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो कि किसी भी वजह से अपने wiring में fan regulator नहीं लगवा पाते हैं। लेकिन दोस्तों, यदि आप भी इन लोगों की list में हैं तो आपको हमारा ये post जरूर पढना चाहिए लेकिन यदि आप इन लोगों के list में नहीं हैं तो भी अपनी जानकारी को बढ़ने के लिए इसे जरूर पढ़ें। आज हम इसमें Fan Regulator के बारे में पूरी details के साथ बताते हुए इसके लाभ और हानि के बारे में भी बता रहे हैं.....