Stabilizer बनाने के लिए जरूरी सभी componants के लिस्ट

Componants for making 200/300 watts mannual stabilizer


Stabilizer से आपलोग परिचित तो होंगे ही। इसका इस्तेमाल बिजली के voltage को नियंत्रित करने में किया जाता है। विभिन्न तरह के कामों के लिए विभिन्न तरह के स्टेबलाईजर की जरूरत पड़ती है। लेकिन यदि बात करें आमतौर पर सभी घरों में छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले stabilizer की, तो आमतौर पर सभी घरों में 200 या 300 watts के स्टेबलाईजर इस्तेमाल किये जाते हैं। हालांकि, market में 200/300 वाट्स के रेडीमेड स्टेबलाईजर भी उपलब्ध होते हैं लेकिन उनकी गुणवत्ता किसी machenic द्वारा बनाये गए स्टेबलाईजर से कम ही होती है।

ऐसा नहीं है कि readymade स्टेबलाईजर खराब होते हैं, लेकिन ये सच है कि मैकेनिक द्वारा बनाये गए स्टेबलाईजर उससे कहीं ज्यादा बेहतर होते हैं। तो ऐसे में यदि आपको भी अपने घर के छोटी-सी जरूरतों को पूरा करने के लिए 200/300 watts के stabilizer की जरूरत है तो market से खरीदने के बजाये आप किसी मैकेनिक से भी बनवा सकते हैं। लेकिन यदि आप खुद ये काम करने में interest रखते हैं और electronics में आपका थोड़ा-सा भी अनुभव है तो आप हमारे द्वारा बताये तरीकों को follow करके खुद से भी स्टेबलाईजर को बना सकते हैं। तो चलिए आज जानते हैं कि एक 200 या 300 watts के mannual stabilizer को बनाने में किन-किन सामानों का उपयोग किया जाता है।


👤 200/300 watts के stabilizer बनाने के लिए जरूरी सामानों के list

1) Cabinet (ढ़ांचा या खोला)

स्टेबलाईजर के सभी सामानों को जिस ढाँचे या खोले में फिट किया जाता है उसे cabinet कहा जाता है। आपके जरूरत के अनुसार बनाये जाने वाले stabilizer के अनुसार उसके लिए अलग-अलग cabinet की जरूरत पड़ सकती है। आमतौर पर 200 watts और 300 watts के stabilizer को एक ही कैबिनेट में fit कर दिया जाता है क्योंकि दोनों watts के transformer अलग-अलग size के जरूर होते हैं लेकिन एक ही cabinet में आराम से फिट आ जाते हैं। 


200 watts stabibilizer allcomponants list


इसके बाद फिर इसके बाद बाकी सभी componants दोनों ही watts के स्टेबलाईजर में एक ही तरह के इस्तेमाल किये जाते हैं। लेकिन एक बात का ख़ास ध्यान रहे कि अभी हम आपको mannual stabilizer के बारे में बताने जा रहे हैं। इसलिए इसे बनाने के लिए आपको mannual स्टेबलाईजर के cabinet खरीदने की ही जरूरत पड़ेगी। यदि आप automatic वाला cabinet खरीदेंगे तो उसमें mannual स्टेबलाईजर के componants को फिट नहीं किया जा सकेगा। आमतौर पर mannual स्टेबलाईजर के cabinet की कीमत 70 रूपये के करीब पड़ती है।

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2) 200 या 300 watts का auto transformer (ऑटो ट्रांसफार्मर)

सबसे पहले आपको ये जान लेना बहुत ही जरूरी है कि किसी भी स्टेबलाईजर का मुख्य भाग transformer ही होता है। किसी भी stabilizer का वजूद सिर्फ-और-सिर्फ उसके transformer से ही होता है। बाकी जो भी componants लगाये जाते हैं, वो सिर्फ आसानी से इस्तेमाल करने योग्य बनाने के लिए लगाये जाते हैं। तो, यदि आप 200 watts का stabilizer बनाना चाहते हैं तो आपको transformer भी 200 वाट्स का ही लेना होगा लेकिन यदि आप 300 watts का स्टेबलाईजर बनाना चाहते हैं तो आपको ट्रांसफार्मर भी 300 वाट्स का ही लेना होगा।

यदि stabilizer में इस्तेमाल किये जाने वाले एक सामान्य ट्रांसफार्मर की बात करें तो 200 watts के ट्रांसफार्मर की price 300 रूपये और 300 watts के transformer की कीमत 450 रूपये तक हो सकती हैं। अर्थात दोनों के कीमत में 150 रूपये का अंतर। इसलिए हमारी पर्सनल सलाह ये है कि यदि आप 300 watts के लिए transformer खरीदने में सक्षम हैं तो 200 वाट के बजाये 300 वाट्स के ही stabilizer बनाएं ताकि बाद में जरूरत पड़ने पर आप उसपर 300 watts तक का भी लोड दे सकें।


3) DPDT (Double Pole Double Throw) Switch

Stabilizer का उपयोग 2 स्थितियों में किया जाता है। पहली, जब हमारे घर में जरूरत से कम वोल्टेज हो, तो उस समय हम स्टेबलाईजर का इस्तेमाल step-up के रूप में करते हैं जिसके तहत हमें जरूरत के अनुसार original voltage की अपेक्षा ज्यादा voltage मिलते हैं। दूसरी, जब हमारे घर में जरूरत से ज्यादा वोल्टेज हो तो उस समय stabilizer का इस्तेमाल हम step-down के रूप में करते हैं। इस स्थिति में स्टेबलाईजर हमें high volt के ओरिजिनल voltage से कम और उचित volt का supply प्रदान करता है।

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एक mannual स्टेबलाईजर में step-up और step-down को निर्धारित करने के लिए जिस switch का इस्तेमाल किया जाता है उसे DPDT स्विच कहा जाता है। DPDT का full form होता है, Double Pole Double Throw. इस स्विच का काम होता है एक बार में 2 connection के रूट को बदलना। 200 watts के stabilizer में 5 ampere तक का DPDT इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी कीमत 10-15 रूपये होती है।


4) Rottery switch

चूंकि हम mannual (हस्तचालित) स्टेबलाईजर बनाने जा रहे हैं तो जाहिर-सी बात है कि इसमें voltage को नियंत्रित करने के लिए किसी बहुविकल्पीय switch की तो जरूरत पड़ेगी ही। स्टेबलाईजर में इसी स्विच को रोटरी स्विच के नाम से जाना जाता है। इस स्विच में वोल्टेज को नियंत्रित करने के लिए 1 से लेकर 8 तक विकल्प होते हैं। 

यदि stabilizer स्टेप-अप मोड में हो तो rottey स्विच के 1 नंबर पर उतना ही volt आउट होगा जितना बिजली का ओरिजिनल volt होगा। इसके बाद ज्यों-ज्यों इस rottery को दायें तरफ घुमाकर इसे ज्यादा नंबर पर करते जायेंगे इसका output voltage बढ़ता जायेगा। इस तरह से कोई भी स्टेबलाईजर ओरिजिनल वोल्टेज के दोगुना तक voltage प्रदान कर सकता है।

यदि stabilizer स्टेप-डाउन मोड में हो तो भी rottery switch के 1 नंबर पर रहने पर ये original input के बराबर voltage ही आउट करेगा। लेकिन ज्यों-ज्यों इस स्विच को दायें तरफ घुमाकर ज्यादा नंबर पर करते जायेंगे इसका आउटपुट वोल्टेज कण होता जायेगा। इस तरह से कोई भी stabilizer original वोल्टेज का आधा तक voltage को आउट कर सकता है।

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लेकिन एक बात का ध्यान रहे, हमने आधे और दोगुने voltage मिलने की बात सिर्फ-और-सिर्फ सामान्य तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली stabilizer के बारे में ही बताया है। हकीकत तो ये है कि ख़ास तरह से बनाये गए transformer से ओरिजिनल voltage के मुकाबले जितना चाहे उतना कम और जितना चाहे उतनी ज्यादा voltage प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरत के अनुसार ख़ास तरह के ट्रांसफार्मर की जरूरत पड़ेगी।


5) Relay kit (रिले किट)

घरों में कभी भी एक-समान voltage नहीं रहते हैं। वोल्टेज में हमेशा ही उतार-चढ़ाव होते रहता है। इसलिए ऐसे हालत में stabilizer के output voltage भी input voltage के अनुपात में घटते-बढ़ते रहते हैं। लेकिन ऐसे में कभी-कभी आउटपुट वोल्टेज जरूरत से ज्यादा हो जाता है तो कभी कम हो जाता है। जब आउटपुट वोल्टेज कम होता है तब तो कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जब स्टेबलाइजर का आउटपुट वोल्टेज जरूरत से ज्यादा हो जाए तो इसमें लगाये उपकरण को नुकसान पहुँच सकता है।


Stabilizer 7 ampere relay kit


इसी समस्या को दूर करने के लिए stabilizer में एक relay किट लगाया जाता है। इस किट की खासियत ये होती है जब भी पहले से सेट किये गए वोल्टेज से ज्यादा voltage आउट होने लगता है तब ये किट सक्रिय हो जाता है और output का supply रोक देता है। ऐसे में stabilizer के output पर supply आना बंद हो जाता है जिससे इससे जुड़े हुए उपकरण को भी supply नहीं मिलता है और वो उपकरण काम करना बंद कर देता है।

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Relay kit द्वारा over supply को रोकने की इस क्रिया को auto cut (ऑटो कट) कहा जाता है और इस स्थिति में स्टेबलाइजर में लगा हुआ red colour का led (बल्ब) जल उठता है जिससे लोगों को ऑटो-कट होने का पता तुरंत चल जाता है और वो फिर से rottery switch को घुमाकर सही point पर कर देते हैं जिससे फिर से supply मिलने लग जाता है। Relay लगे हुए रिले किट की कीमत करीब 30 रूपये तक पड़ती है।


6) Main wire (मुख्य तार)

Stabilizer में supply देने के लिए जिस wire का इस्तेमाल किया जाता है उसे main wire कहा जाता है। Market में प्लग लगे हुए बहुत तरह के main wire उपलब्ध हैं। स्टेबलाइजर में सामान्यतः 2 मीटर का वायर उपयोग किया जाता है जिसकी कीमत करीब 25 रूपये तक हो सकती है। यदि आप चाहें तो खुद से भी अच्छी quality का लूज वायर और plug लेकर उसे main wire की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।


7) Fuse और fuse holder

ऐसा नहीं है कि घरों में हमेशा कम voltage ही होते हैं। बहुत बार तो जरूरत से भी ज्यादा voltage घरों में होते हैं और ऐसी स्थिति में stabilizer के dpdt स्विच को down करना पड़ जाता है। लेकिन जब input voltage बहुत ज्यादा हो तो या फिर जब भी स्टेबलाइजर में किसी तरह की कोई शॉर्ट-सर्किट हो तो उस स्थिति में उसके transformer को नुकसान पहुँच सकता है।

इस स्थिति से बचने के लिए स्टेबलाइजर में fuse का इस्तेमाल किया जाता है। जब भी किसी तरह की कोई शॉर्टिंग की समस्या होती है तो उस समय कोई भी उपकरण जरूरत से ज्यादा current की खपत करने लगता है। ऐसा ही stabilizer के साथ भी होता है और शॉर्टिंग के समय ये भी जरूरत से ज्यादा current खपत करने लगता है जिसे fuse बर्दाश्त नहीं कर पाता है और वो जल जाता है। फ्यूज के जलते ही stabilizer में supply मिलना बंद हो जाता है और फिर इसके बाद किसी भी तरह का कोई नुकसान होने से भी बच जाता है।

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लेकिन चूंकि fuse बार-बार जलते रहता है, तो इस स्थिति में हर बार stabilizer के cabinet को खोलकर उसका फ्यूज बदलना बहुत ही मुश्किल भरा काम हो सकता है। इसलिए किसी भी उपकरण में एक fuse holder को इस तरह से लगा दिया जाता है कि जब भी इसका फ्यूज जले तो बिना cabinet को खोले ही उसे सिर्फ फ्यूज होल्डर के ढक्कन को खोलकर फ्यूज को आसानी से बदला जा सके।


8) Switch और 5-pin shocket

जब भी किसी device का उपयोग न करना हो तो उसे off करने के लिए उसमें एक switch लगा हुआ होता है। Stabilizer में भी एक स्विच लगाया जाता है ताकि जब जरूरत न हो तब इसे ऑफ कर दिया जाये। साथ ही, स्टेबलाइजर से किसी भी दूसरे उपकरण को जोड़ने के लिए एक 5-पिन शॉकेट का इस्तेमाल किया जाता है। इसी shocket में दूसरे उपकरण के प्लग को लगाया जाता है जिसके बाद उस उपकरण को stabilizer के द्वारा आउट किया गया supply मिलने लगता है।


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9) Voltmeter (वोल्टमीटर)

Mannual stabilizer में output voltage की निगरानी करने के लिए उसमें एक voltmeter भी लगाया जाता है। इससे लोगों को हमेशा ही पता चलते रहता है कि stabilizer उस समय कितना volt को आउट कर रहा है। यदि मीटर में कम या ज्यादा वोल्ट प्रदर्शित हो रहा होगा तो लोग उसे देखकर voltage को फिर से नियंत्रित भी कर सकते हैं।


10) Led और led rubber

Mannual stabilizer में 3 तरह के led (एक तरह का बल्ब) का इस्तेमाल किया जाता है।

1. Green led :- जिस समय स्टेबलाइजर सही से अपना काम कर रहा होता है, उस समय उसमें लगा हुआ हरा रंग का एलईडी जलता है जिसका मतलब होता।

2. Red led :- Auto-cut हो जाने की स्थिति में लाल रंग का एलईडी जलता है जिससे लोगों को ऑटो-कट होने का पता तुरंत चल जाता है।

3. Yellow led :- यदि stabilizer का fuse जल जाए तो उस समय स्टेबलाइजर काम करना बंद कर देता है। तो ऐसे में एक साधारण लोग समझेंगे कि कहीं स्टेबलाइजर खराब तो नहीं हो गया है। इसलिए इसमें एक पीले कलर का एलईडी भी लगाया जाता है जो फ्यूज के जल जाने की स्थिति में जलता है। ऐसे में लोगों को तुरंत पता चल जाता है कि फ्यूज जल गया है और फिर इसके बाद वो खुद से भी इसे बदल सकते हैं।

Led rubber:- Stabilizer के cabinet में led के size से बड़ा छेद किया हुआ रहता है जिसमें led को नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए इस छेड़ में एक led रबर लगाया जाता है और तब इस रबर में ही led को लगाया जाता है। इस रबर का का एक और फायदा ये होता है कि cabinet से led का सीधा संपर्क ख़त्म हो जाता है जिससे स्पार्किंग होने का चांस ख़त्म हो जाता है।


11) Scroo और nut-bolts

सभी componants को कैबिनेट से कसने के लिए विभिन्न तरह के स्क्रू और नट-बोल्ट्स का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही cabinet को रखे जाने के स्थान से ऊँचा करने के लिए कुछ गोरे का इस्तेमाल भी किया जाता है।

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